मैं,
मेरा मन
और मेरी झुलनेवाली कुर्सी..
मेरी कुर्सी
अब भी
झुलती रहती है
कभी - कभी
तेज हवा के झोंकों से
पर उसपर
मैं नहीं बैठता
बैठने पर भी
सुकून नहीं मिलता..
तुम जो नहीं होतीं
मेरे पीछे ,
अपने लंबे बालों का चंवर हिलाते हुए.
मेरा मन
यहाँ ..कहाँ रहता है
मेरे पास?
गया है बाहर कहीं
मुझसे बिन बताये ही
होगा वहीँ
हाँ.. हाँ
वहीँ कहीं..
जहाँ तुम होगी ,
खोया होगा
तुम्हारे ख्यालों में
या भंवरा बन
मंडरा रहा होगा
तुम्हारे जुड़े में गुंथे फूलों पर.
और बचा मैं..
सोंचता हूँ,
कहाँ जाऊं,
घर में तो,
यादों ने डेरा डाल रखा है
इनसे मुंह छिपाऊँ
तो कहाँ जाऊं
बाहर भी तो
कहीं भी,
किसी चहरे में
ढूँढने पर भी
तुम्हारा अक्स नहीं दिखता ?
मैं ,
मेरा मन
और मेरी झुलनेवाली कुर्सी
सभी याद करते हैं
तुम्हे ,
सताए हैं तुम्हारे ही
और सुलझा रहें हैं
अपने - अपने हिस्से की पहेली,
तभी से दिन-रात,
जब से तुम
कल आने का,
जरुर आने का
कच्चा वादा करके गयी हो.
Copyright@संतोष कुमार 'सिद्धार्थ', २०१२
मेरा मन
और मेरी झुलनेवाली कुर्सी..
मेरी कुर्सी
अब भी
झुलती रहती है
कभी - कभी
तेज हवा के झोंकों से
पर उसपर
मैं नहीं बैठता
बैठने पर भी
सुकून नहीं मिलता..
तुम जो नहीं होतीं
मेरे पीछे ,
अपने लंबे बालों का चंवर हिलाते हुए.
मेरा मन
यहाँ ..कहाँ रहता है
मेरे पास?
गया है बाहर कहीं
मुझसे बिन बताये ही
होगा वहीँ
हाँ.. हाँ
वहीँ कहीं..
जहाँ तुम होगी ,
खोया होगा
तुम्हारे ख्यालों में
या भंवरा बन
मंडरा रहा होगा
तुम्हारे जुड़े में गुंथे फूलों पर.
और बचा मैं..
सोंचता हूँ,
कहाँ जाऊं,
घर में तो,
यादों ने डेरा डाल रखा है
इनसे मुंह छिपाऊँ
तो कहाँ जाऊं
बाहर भी तो
कहीं भी,
किसी चहरे में
ढूँढने पर भी
तुम्हारा अक्स नहीं दिखता ?
मैं ,
मेरा मन
और मेरी झुलनेवाली कुर्सी
सभी याद करते हैं
तुम्हे ,
सताए हैं तुम्हारे ही
और सुलझा रहें हैं
अपने - अपने हिस्से की पहेली,
तभी से दिन-रात,
जब से तुम
कल आने का,
जरुर आने का
कच्चा वादा करके गयी हो.
Copyright@संतोष कुमार 'सिद्धार्थ', २०१२
