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Friday, May 4, 2012

दर्द के प्रतिबिम्ब : कुछ हाइकू

१.
रोता है दिल
घर का भी 
जब  भी लड़े भाई एक-दूसरे से .


२.
फटती है जमीन की छाती भी
सिर्फ सूखा पड़ने से नहीं ,
खेतों के टुकड़े-टुकड़े होने पर भी.


३.
आसमान रोता है
छुपकर अँधेरी सर्द रातों में,
बिखरी हैं ओस की बूंदें गवाही में.


आखिर में प्रस्तुत है .. एक हल्की-फुल्की फुसफुसाती,गुदगुदाती हुई सी क्षणिका ..


सुनो !
धीमे से ,
और जरा प्यार से
अपनी आँखे खोलना...
कल रात से
कैद हूँ
तुम्हारे सपनों में !

Copyright@संतोष कुमार 'सिद्धार्थ', २०१२.

Sunday, February 26, 2012

तिनके का दर्द


एक तिनका
न जाने क्यूँ
बाकी रह गया
घोंसले में
सजने से

जी रहा है..
आजकल डर–डर के
गिन रहा है
सांसे.. इस चिंता में
हवा उड़ा न ले जाए
पानी बहा न दे
धुप जला न दे
मिट्टी दफ़न न कर दे
उसके अस्तित्व को..

सोंचता रहता है..
अब कैसे निहारेगा ?
नजदीक से
प्यारी चिड़िया को ,
कैसे देखेगा ?
चिड़िया के बच्चों को,
चहकते हुए,
पंख फैलाते हुए,
जीने का अंदाज..
सीखते हुए .

Copyright@संतोष कुमार ‘सिद्धार्थ’, २०१२