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Tuesday, October 8, 2013

दूरी

बढती जा रही है
दूरी..
हर रोज 
शहरों की
गाँव से !

हो रहा है
अलग 
हर रोज 
एक सगा 
अपने ही दूसरे से !

मैंने कई बार 
ऐसा सुना है
शहरी स्कूलों के बच्चे
गाँव में
बस रहे भाई को
ड्राईवर का सगा बता रहे थे !

Copyright@संतोष कुमार "सिद्धार्थ", २०१३


Saturday, October 27, 2012

आजकल

कुछ घुल गया है पानी में,
है  दूषित कर गया 
कोई चमन की  हवा को 
न जाने क्या..शायद कोई 
नया रोग सा लगा है 
इस ज़माने को 

नोचने में कमीजें 
एक - दूसरे की

खुश हो रहे हैं 
लोग कई


बचने की कोशिश में 
जो छुपे किसी  के पहलू में
हैं उनकी चादरें
पहले से कालिख में सनी हुईं

जिधर देखो
रंगे सियारों की
फ़ौज सी खड़ी है

किसके साथ खड़ा होऊं?
आज नहीं तो कल ..
रंग तो सबकी उतरी है

काट कर
बांटने में
व्यस्त हैं जोडने वाले
जो हैं समर्थ
ओढ़ कर मुफलिसी
जड़ रखे हैं 
खुद  के मुंह पर ताले

ऐ खुदा , हे भगवान !
मत हँस..इन गरीबों पर
रहम कर 
भेज कोई रसूल अपना
बहुत हो चुका...
अब सब्र नहीं होता ,
खुद से अपनो का इलाज नहीं होता !!
 
Copyright@संतोष कुमार 'सिद्धार्थ', २०१२

Monday, October 1, 2012

बापू का चश्मा

बापू...
हे बापू !
जम रही है धूल
तुम्हारे चश्में पर

छोड गए थे
तुम इसे 
इस धरा पर
हमने रखा था
थाती समझकर
प्रेरित करता था हमें
सच की राह चलने को
अहिंसा का धर्म जीने को

पढ़ा है
अख़बारों में
चश्मे की धूल साफ हुई है
ये फिर से नीलाम हुई है
और हम हैं 
कि चुप हैं
आँखों पर हाथ रखे
कानों में उंगली डाले 
बंदरों की तरह ...
और होती रहती है
नीलामी रोज -रोज
आदर्शों की, संस्कारों की
सफेदपोश समाज के ठेकेदारों द्वारा ..
छपती हैं
तस्वीरें - तहरीरें 
लोग पढते हैं 
चर्चा करते हैं
मनोरंजन की खुराक समझकर.

Copyright@संतोष कुमार 'सिद्धार्थ' , २०१२ 

Friday, September 21, 2012

आजकल

आज कल
हम में से
बहुतेरे लोग 
हांफ रहे
काँप रहे
लगातार भाग रहे

दरिया में
पर्वत पर
दोजख में भी
हैं बार-बार झांक रहे

काट रहे
अपनों को
मुल्क भी
बाँट रहे

क्या सो गया 
जमीर उनका
तभी तो , देखें वे रोज
सपने भी
कालिख सने

क्यों बस उन्हें
चाहिए इस जहाँ में
ऐसा ..वैसा.. कैसा भी..
सिर्फ पैसा , पैसा और बस पैसा ही !

Copyright@संतोष कुमार  'सिद्धार्थ'

Friday, April 20, 2012

जिन्दगी

जिन्दगी..
दो मुहें सांप जैसी
बीता कल खींचे पीछे,
खींचे आगे
आनेवाला कल
रहे पशोपेश में वर्तमान
किसकी सुने,
किधर जाए


जीना तो चाहे  वो
भविष्य की डगर पर
संजोये सपनों को
पर उलझा रहे ,
साफ़ करता रहे
खुशियों पर
पड़ी धूल भूत की ...


संशय में है
आज का लम्हा
आज की खुशी
समय की घडी में
रेत सी फिसल ना जाए.

Copyright@संतोष कुमार "सिद्धार्थ", २०१२ 

Wednesday, February 22, 2012

मतदान का अधिकार !


जनता..
फिर से
भर रही हुंकार
अबकी बार ..
नेता गण में भी
मचे चीत्कार ..
वो भी हों
हैरान – परेशान,
न सो सकें
चैन से.. ,
न बजा सकें बंशी
कि फिर से सत्ता में
काबिज होगी दुबारा
उन्ही की सरकार
अगर जो
ना रखा हो
सही हिसाब ,
सही ख्याल
जनता के आंसुओं का !

Copyright@संतोष कुमार ‘सिद्धार्थ’, २०१२ 

Saturday, February 11, 2012

एक गुलाब !


एक गुलाब टांक दो
मेरे कोट की बटन होल में,
एक गुलाब खोंस दूं
तेरे बालों के जूडे में.

देखें...
कौन किस पर मर मिटता है?
तू.. मुझपर,
या मैं तुझपर
या फिर
ये गुलाब मर मिटे
हमारी किस्मत पर.

अगर जो कोई
ज़माने में
देखकर हमें जले
तो...भेज दो
उसके भी घर
टोकरी भर गुलाब !!

Copyright@संतोष कुमार ‘सिद्धार्थ’, २०१२ 


आप सबों को 'प्रेम-दिवस' (Valentine Day) की हार्दिक शुभकामनाएं. एक विनम्र निवेदन है कि अगर दुनिया में  खुशी,  मुस्कान और प्यार बिखेरना चाहते हों तो गुलाब भेंट करना ना भूलें.

Sunday, January 8, 2012

अन्ना का संघर्ष !


कैसे जुटेंगे ?
कैसे साथ देंगे ??
लाखों लोग
अन्ना के आंदोलन में
अन्ना के अनशन में
भ्रष्टाचार मिटाने को

अब भी
जुटे रहतें है
करोड़ों जन
दिन – रात , चौबीसों घंटे
बुझाने को
पेट की आग,
जुटाने को
दो जून रोटी
और मुट्ठी भर अन्न !

Copyright@संतोष कुमार ''सिद्धार्थ'', २०१२




Sunday, November 27, 2011

आधे – अधूरे से हम

कोई शाम से
सुबह की रौशनी 
मांग कर देखे
दिन से.. 
रात की शीतलता
मांगे चाँदनी से 
तपती दुपहरी
और पुरवाई से
पछिया की महक
नहीं मिलती..
ना मिलेगी
सभी हैं
कुछ मायनों में
आधे – अधूरे
हैं दो पहलू
एक ही सिक्के के
कितने करीब ..
पर कितने दूर

मैं सोंच में था
पर कोई तो
आगे बढता,
समझाता ..
सांत्वना देता मुझे
मैं मांग रहा था
खुदा से..
इंसानियत की भीख
और जाने क्यूँ
उम्मीद में था
इंसानों से ..खुदाई की

मुद्दतों से..
टीस है मन में
खुदा..सीने से बाहर आकर
अपना चेहरा क्यूँ नहीं दिखाता??? 
क्यूँ लगाता नहीं गले????? 
हर दूसरे बंदे को..
जबकि है छिपा–बसा
नूर-ऐ-खुदा सभी के अंदर !!
Copyright@संतोष कुमार ‘सिद्धार्थ’, २०११ 

Thursday, October 27, 2011

नेता जी उवाच..

(१)
मैं हूँ..
आपका जन-प्रतिनिधि,
जन सेवक,
जनता का,
जनता के लिए..
जनता द्वारा चुना गया.
गिरवी हैं..
जनता के
वोट भी.. नोट भी,
और उनके सुख-चैन भी
मेरी तिजोरी में.

(२)
आऊँगा.. बार-बार
पास तुम्हारे ..
बिना हिचक के,
बिना शर्म के
हाथ जोड़े, झोली फैलाये
करने नवीनीकरण ..
जन-सेवा के ठेके का.

(३)
हो जायेगी
मंत्रिमंडल में,
जगह भी पक्की..
अबकी बार,
भूलना मत
मेरा नया निशान...
हेलीकॉप्टर से थैले गिराता
तुम्हारा नेता महान !!

Copyright@संतोष कुमार,२०११  

Thursday, October 20, 2011

आओ जलायें दीये .. आस्था और विश्वास के.


सुनो.. मेरे भाई
भाई कुम्हार !
मेरी छोटी सी विनती
कर लो स्वीकार
भूलूँगा नहीं..
कभी तेरा उपकार

अबकी बार..
जो मिटटी लाना
दीये बनाने को
उसमें है मुझे मिलाना
और चार मुठ्ठी मिटटी
बच्चों का मन रखने को

क्योंकि..अब भी शेष है..
आस्था और विश्वास
मन में हम-सबके ,
कि कुछ तो प्रभाव छोड़ेगी ..
मुठ्ठी भर पवित्र मिटटी
लाया हूँ जिसे 
मस्जिद, मंदिर, गिरिजा और गुरूद्वारे से

ताकि मैं भी..
जला सकूं करोडों दीये
आत्मीयता और प्यार के,
सदाचार और सद्भाव के
मन में मेरे-तुम्हारे,
और ह्रदय में हम-सबके

मेरे कुम्हार भाई..
करना मदद मेरी ..
कि हम जला सकें दीये,
आस्था और विश्वास के.

Copyright@Santosh kumar, 2011

आप सबको पावन ज्योतिर्मय पर्व दीपावली की हार्दिक शुभकामनायें!!. प्रभु कृपा से आपके जीवन में उल्लास और सुख-शांति हमेशा बनी रहे .
My new post of English Blog with Diwali Greetings : Happy Diwali !!

Photo Courtesy : Google Images

Friday, September 30, 2011

शैतान का साया

शैतान का साया
है चंहुओर छाया
उसकी कोई...
जाति नहीं
धर्मं नहीं
न कोई क्षेत्र विशेष
न कोई रंग
मुझमें ..तुझमें..
भी हैं उसके अंश



जब भी है मन के अंदर
उबता.. अकुलाता   
जरा सा बल पाकर
भाई से लडता
पडोसी से भिड़ता
धमाके करता,
अपहरण करता
आपस की भेद-भाव बढाता


जन-मानस में
कोहराम मचाता
लोगों का क्रंदन सुनकर
खिलखिलाता.. अट्टहास करता
और ..भूल जाता
उसका भी तो घर है
बच्चे हैं
बूढी अम्मा है
जो है ताक रहे..
उसकी राह..
घर लौटने का
अपलक.. अश्रुभरी आँखों से.

Copyright@Santosh Kumar, 2011

आइये, मिल-जुल कर आपस में सद-भाव और प्रेम का संचार करें. और मन में बैठे घृणा, द्वेष, क्रोध, भ्रष्टाचार भेदभाव रूपी शैतान के अंश को दूर भगाएं.



Sunday, September 25, 2011

जिंदगी.. नये जमाने की.

१.
नये जमाने के
नये हैं तौर-तरीके
बदले-बदले से हैं
जिंदगी के सलीके


तंग दरवाज़ों में,
बंद खिड़कियों में
एअर-कंडिसनर की हवा भली
बिना मोबाइल-अलार्म के
कितनों की नींद ही ना खुली..


ज़रूरी हो गयी गोली
चैन से सोने के लिए
उससे भी ज़रूरी
सुबह की चाय के लिए.


२.
घर से दफ़्तर
दफ़्तर से घर
पता ही ना चले
क्या होता बाहर


पड़ोस मे कौन आया
किसने न्योता भिजवाया
कौन टीचर बच्चों को पढ़ाए
किस नंबर की बस उसे स्कूल ले जाए


ट्यूब-लाइट की चकाचौंध में
जिंदगी जगमगाए..
देखना हो सूरज को..
तो हिल-स्टेशन जाएँ.


Copyright@Santosh kumar, 2011
Picture courtesy : Google Images