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Friday, November 13, 2015

मन की भाषा , मन का देश !

जहाँ....
आँखों के इशारे भर से
दुनिया की
तस्वीर बदलती है !
जहाँ ...
कोई जोर नहीं,
कोई शोर नहीं
सभी समझते हैं
मन ही मन...
मन की भाषा
वहीँ चलना है,
वहीँ बसना है !!

Copyright@संतोष कुमार 'सिद्धार्थ',2015

Saturday, May 3, 2014

रिश्ता : मेरा - तुम्हारा

तू...
कविता है
गीत है
छंद है
भाव है
बसी रहती हो
शब्दों की लड़ियों में 
पुस्तकों के पन्नों में
मैं ...
आवरण हूँ 
पृष्ठभूमि हूँ
रक्षक हूँ
तुम्हारे सौंदर्य का...
तुम सहज स्वप्न हो
मैं यथार्थ हूँ..
बस ..
यही परिभाषा है
इतना सा है
मेरा - तुम्हारा रिश्ता !

Copyright@ संतोष कुमार 'सिद्धार्थ', २०१४.

Sunday, July 7, 2013

सपने !





आओ सपने पिरोयें
मोतियाँ तुम्हारीं
धागे मैं लाया हूँ !

Copyright@संतोष कुमार 'सिद्धार्थ', २०१३.

Saturday, April 6, 2013

कुछ अनकही बातें...!

वापस पलट आओ
जहाँ हो
वहीँ से
एकबार देख तो लो
सुन तो लो 
वो सारी बातें 
मेरी जुबान की..
जो बयां कर रही हैं
मेरी आँखें..तुम्हे
तुम्हारी राहों को
अपलक निहारते हुए..!

Copyright@संतोष कुमार 'सिद्धार्थ', २०१३

Friday, February 22, 2013

अंतराल

वक्त की गिनती 
रोज बढाती जाती है
संख्या..
दिन, महीनों और सालों के,
हमारे विछोह के...
लोग ताने कसते है
समय-अंतराल की दुहाई देकर
पर मैं कहता हूँ,
हाँ सच-मुच जानता हूँ
रोज कम हो रहे हैं
अंतराल ..
दिन, महीने और साल
बेहद करीब आ रहे हैं दिन ,
क्षितिज के पार
चैन से,
बेख़ौफ़ .. बेफिक्र होकर मिलने के !
 
Copyright@संतोष कुमार 'सिद्धार्थ', २०१३.

Thursday, February 14, 2013

पिताजी का स्वेटर

जीवन की डगर पर 
धूप -छांव में,
सर्द लम्हों  में ,
अकेले सफर में
जब भी कभी
मेरा मन डरता है
कदम बढ़ाते ..
घबराता है
मैं ..आँखे बंद कर
थके शरीर को संभाल 
पिताजी का स्वेटर 
पहन लेता हूँ.
और फिर ..
आत्मविश्वास से भरा मन ले 
तेज - मजबूत कदमों से
दुनिया जीतने निकल पड़ता हूँ.

Copyright@संतोष कुमार 'सिद्धार्थ' , २०१३




Tuesday, October 9, 2012

ख्वाहिशें...


ख्वाहिशें...
मेरी भी हैं
तुम्हारी भी
पर हम हैं
कि जी रहे 
जिंदगी रोज-रोज
वैसी ही 
जो बस 
इतना सामर्थ्य रखती हों
जो चुक जाए 
करने में पूरी फरमाइशें ..
दुनिया की,
दुनियादारी की .

Copyright@संतोष कुमार 'सिद्धार्थ', २०१२ 

Tuesday, June 12, 2012

परदेशी

जब से है लौटा
परदेशी घर ..अपने
ढूंढ रहा है ..
अपनेपन का अहसास
घर की दीवारों में,
नए - पुराने चेहरों में,
घूरती निगाहों में  
वही पुराना भरोसा
वही विश्वास..


बदली- बदली सी है  
हवा भी, फ़िजा भी
हवा में खुशबू तो है ,
पहले सी सनसनाहट भी ,
लेकिन गर्मजोशी नहीं 
सिर्फ टंगी तस्वीरे नहीं
बदले हुए हैं  देवी -देवता भी,
और तरीके भी
उनकी नुमाइंदगी के...


परदेशी
पशोपेश में है
घर तो उसी का था
पर जाने कैसे?
वक्त के अंतराल में ..
घर का मौसम बदल चुका था !


परदेशी 
सोंच में है,
पलटने को है
वापस परदेश ...
कहीं बना न ले
परदेश को ही
देश अपना , घर अपना !

Copyright@संतोष कुमार 'सिद्धार्थ', २०१२

Saturday, June 9, 2012

मैं , मेरा मन और मेरी झुलनेवाली कुर्सी

मैं,
मेरा मन
और मेरी झुलनेवाली  कुर्सी..


मेरी कुर्सी 
अब भी 
झुलती रहती है
कभी - कभी 
तेज हवा के झोंकों से
पर उसपर 
मैं नहीं बैठता 
बैठने  पर भी
सुकून नहीं मिलता..
तुम जो नहीं होतीं
मेरे पीछे , 
अपने लंबे बालों का चंवर हिलाते हुए.


मेरा मन
यहाँ ..कहाँ रहता है
मेरे पास?

गया है बाहर कहीं 
मुझसे बिन बताये ही 

होगा वहीँ
हाँ.. हाँ 
वहीँ कहीं..
जहाँ  तुम होगी ,
खोया होगा 
तुम्हारे ख्यालों में
या भंवरा बन 
मंडरा रहा होगा
तुम्हारे जुड़े में गुंथे फूलों पर.


और बचा मैं..
सोंचता हूँ,
कहाँ जाऊं,
घर में तो,
यादों ने डेरा डाल रखा है
इनसे मुंह छिपाऊँ
तो कहाँ जाऊं
बाहर भी तो
कहीं भी,
किसी चहरे में
ढूँढने पर भी
तुम्हारा अक्स नहीं दिखता  ?

मैं , 
मेरा मन 
और मेरी झुलनेवाली कुर्सी
सभी याद करते हैं
तुम्हे ,
सताए हैं तुम्हारे ही
और सुलझा रहें हैं
अपने - अपने हिस्से की पहेली,
तभी से दिन-रात,
जब से तुम
कल आने का,
जरुर आने का
कच्चा वादा करके गयी हो.


Copyright@संतोष कुमार 'सिद्धार्थ', २०१२ 

Tuesday, May 29, 2012

अनुरोध !

क्यों न ?
तुम ..
बाँध लो
मेरा मन
अपने जूडे की
एक शोख लट से.


अक्सर 
बड़ा ही अनमोल,
अकल्पनीय सुकून
पाया है...
मेरे चंचल मन ने
तुम्हारे गेसुओं की खुशबू में
तुम्हारे पलकों की छांव में!


रहा है
आवारगी में
बरसों से ...
ठहर जाऊं, 
बस जाऊँ यहीं
जो तुम्हारी इजाज़त हो!

Copyright@संतोष कुमार 'सिद्धार्थ', २०१२

Tuesday, May 22, 2012

चाँद की उलझन !

आज फिर
शाम ने
रात के साथ मिलकर
कसम खाई है..
सुबह .. होने ना देगी
मुझे जाने ना देगी.


कहती है..
रोज-रोज
मैं थोडा -सा बदल जाता हूँ..
सिर्फ मेरी शक्ल ही नहीं
मेरे जीने का अंदाज़ भी
जब भी ..
अगली शाम को
सिर उठाता हूँ
झील के पार से
बिखेरने.. चांदनी की किरणें 
तुम्हारे अप्रतिम सौंदर्य पर..

Copyright@संतोष कुमार 'सिद्धार्थ', २०१२

Tuesday, March 27, 2012

मैं कौन हूँ तेरा ..?


जुगनू बनकर
तेरे पीछे-पीछे भागूंगा,
मधुर गीत बन
तुम्हारे कानों से,
तुम्हारे दिल की
धडकनों में उतरूंगा

और जब तुम ...
बंद कर लोगी
पलकें अपनी
मेरे सपनों की अनुभूतियों में,
फिर मैं,
अपने मन के कैनवास पर
तेरा अमिट चित्र उतारूंगा
और बस जाऊँगा ,
तुझसे.. तेरे शहर से कहीं दूर
वहीँ बरसों तक
तेरी बाट निहारूंगा

तू सोंच,
मालूम कर मेरा पता ,
परख कर देख
मन की अनुभूतियों को,
“मैं कौन हूँ तेरा ? “
और क्यों ..
इस जहाँ में आया हूँ !!

Copyright@संतोष कुमार “सिद्धार्थ”, २०१२