Showing posts with label अभिव्यक्ति. Show all posts
Showing posts with label अभिव्यक्ति. Show all posts

Monday, April 11, 2016

मैं और तुम !

बस इतना सा
फर्क है
मुझमे...
और तुझमे...
तुम अक्सर आये
बिन बताये
मिले,
ख्याल बनकर ,
रहे सपनों में,
प्रार्थना में !
और मैं
तुम्हे ढूंढ रहा...
झांक रहा
खिड़कियों से,
पर्दों की ओट से,
दर पर खडा
लंबी कतारों में
मिलने की आस लिए !!

Copyright@संतोष कुमार 'सिद्धार्थ', २०१६ 

Friday, November 13, 2015

मन की भाषा , मन का देश !

जहाँ....
आँखों के इशारे भर से
दुनिया की
तस्वीर बदलती है !
जहाँ ...
कोई जोर नहीं,
कोई शोर नहीं
सभी समझते हैं
मन ही मन...
मन की भाषा
वहीँ चलना है,
वहीँ बसना है !!

Copyright@संतोष कुमार 'सिद्धार्थ',2015

Thursday, July 30, 2015

कुछ बातें!

मैं सोंचता हूँ...
क्यों ना
लिख लूं
और बाँच भी लूं
खुद ही 
कुछ चिट्ठियाँ
मेरे - तुम्हारे नाम की !

क्या होगा..
थोडा मन हल्का होगा
थोडा भारी होगा..
याद आएँगी
कुछ बातें
बरसों पुराने  शाम की !

ऐसे में ही, कहीं दूर..
कोई बादल
भिगो जायेगा 
तुम्हारे झरोखे के परदे 
शायद ...तब कहीं ,
तुम्हे भी बोध होगा
और लिखोगी सच में 
एक खत मेरे नाम की !

Copyright@संतोष कुमार 'सिद्धार्थ',2015

Wednesday, February 11, 2015

कुछ मेरे Facebook पोस्ट से

मैंने पिछले दिनों Facebook  पर पोस्ट किया :

तलाश
-------
ढूंढ रहा हूँ
नयी राह
बुन रहा हूँ
नया सपना
अनुभव है ..
आधी जिंदगी का
देखूँगा .. जिंदगी को
नए चश्मे से !!



मेरा नाम 
---------
मुझे 
पसंद नहीं था
नाम वालों की 
भीड़ में खो जाना..
कुछ ऐसे ही याद कर लेना
मुझ अनाम को !!


Copyright@संतोष कुमार 'सिद्धार्थ', २०१५

Monday, November 10, 2014

साधना !

एक साधु ने कहा
रख तू
मन का ख्याल भी
दे समय
कर निहाल इसे भी
सुन इसकी भी कुछ..

ये बाँट लेगा
दुःख तुम्हारे
रहेगा जो हर पल
साथ तुम्हारे

हो सके ..तो
कर साधना !
साध ले इसे
प्रभु भी सोचेंगे
करेंगे वास यही
चौराहे का मंदिर छोड़कर !

copyright @संतोष कुमार 'सिद्धार्थ ', 2014

Saturday, May 3, 2014

रिश्ता : मेरा - तुम्हारा

तू...
कविता है
गीत है
छंद है
भाव है
बसी रहती हो
शब्दों की लड़ियों में 
पुस्तकों के पन्नों में
मैं ...
आवरण हूँ 
पृष्ठभूमि हूँ
रक्षक हूँ
तुम्हारे सौंदर्य का...
तुम सहज स्वप्न हो
मैं यथार्थ हूँ..
बस ..
यही परिभाषा है
इतना सा है
मेरा - तुम्हारा रिश्ता !

Copyright@ संतोष कुमार 'सिद्धार्थ', २०१४.

Friday, March 28, 2014

खोज !

कभी - कभी
सत्य भी 
भाव रूप छोड़ कर
पात्र रूप में
खोज रहा होता है
हमें ..वैसे ही
जैसे हम उसे
और हम दोनों ही
आस-पास होते हैं
गुजर जातेहैं 
अगल-बगल से
बस ..पहचान नहीं पाते !

Copyright@संतोष कुमार 'सिद्धार्थ', २०१४ 

Tuesday, October 8, 2013

दूरी

बढती जा रही है
दूरी..
हर रोज 
शहरों की
गाँव से !

हो रहा है
अलग 
हर रोज 
एक सगा 
अपने ही दूसरे से !

मैंने कई बार 
ऐसा सुना है
शहरी स्कूलों के बच्चे
गाँव में
बस रहे भाई को
ड्राईवर का सगा बता रहे थे !

Copyright@संतोष कुमार "सिद्धार्थ", २०१३


Sunday, August 25, 2013

पहचान !

क्षितिज से कुछ दूर सही
धुंधले ..उभरते सायों में
तेरी तरफ भाग रहा 
मैं भी हूँ !
हाथों में पुष्प लिए..
उल्लसित मन लिए 
आतुर हूँ...
मिलने को !
मुझको है ..भान तेरा
तू भी पहचान मुझे
कुछ कदम मैं चलूँ!
कुछ कदम तुम चलो!

Copyright@संतोष कुमार 'सिद्धार्थ', २०१३

Sunday, July 7, 2013

सपने !





आओ सपने पिरोयें
मोतियाँ तुम्हारीं
धागे मैं लाया हूँ !

Copyright@संतोष कुमार 'सिद्धार्थ', २०१३.

Thursday, May 16, 2013

यादों का मुसाफिर

चाहे आवाज दो
या न दो 
या फिर
ओढ़ लो 
नकाब कोई
मैं यादों का मुसाफिर हूँ
समय की रेत पर
तुम्हारे निशान
ढूंढ ही लूँगा !

Copyright@संतोष कुमार 'सिद्धार्थ', २०१३ 

Saturday, April 6, 2013

कुछ अनकही बातें...!

वापस पलट आओ
जहाँ हो
वहीँ से
एकबार देख तो लो
सुन तो लो 
वो सारी बातें 
मेरी जुबान की..
जो बयां कर रही हैं
मेरी आँखें..तुम्हे
तुम्हारी राहों को
अपलक निहारते हुए..!

Copyright@संतोष कुमार 'सिद्धार्थ', २०१३

Saturday, March 23, 2013

भंवरा

वो बस जाना चाहता था
तुम्हारी जुल्फों में
तुम्हारी सांसों में
वो मर-मिटना चाहता था,
तुम्हारी अदाओं पर, 
वो मदहोश था 
तुम्हारे दीदार भर से ..
तूने  भी गलत समझा
यूँ ही झटक दिया 
कि वो एक भंवरा है
बस खुशबू चुराने आया है 
आम भंवरो जैसा...

Copyright@संतोष कुमार 'सिद्धार्थ', २०१३ 

Monday, March 18, 2013

उम्मीद !

इस उम्मीद में
कब तक ...
और 
कैसे जीयें?
सभी कहते हैं
बस मन रखने भर को
कि दुनिया बड़ी सुन्दर है
दिखती नहीं
पर है ..कहीं
शायद उस पार कहीं 
पर अपनी फितरत है
जो कहती है 
कि नाउम्मीद होकर 
अब और नहीं जाता..
आज फिर सोंच में हूँ,
पशोपेश में हूँ 
बदलूं इस दुनिया को?
या अपनी फितरत ही बदल डालूँ?

Copyright@संतोष कुमार 'सिद्धार्थ', २०१३

Friday, February 22, 2013

अंतराल

वक्त की गिनती 
रोज बढाती जाती है
संख्या..
दिन, महीनों और सालों के,
हमारे विछोह के...
लोग ताने कसते है
समय-अंतराल की दुहाई देकर
पर मैं कहता हूँ,
हाँ सच-मुच जानता हूँ
रोज कम हो रहे हैं
अंतराल ..
दिन, महीने और साल
बेहद करीब आ रहे हैं दिन ,
क्षितिज के पार
चैन से,
बेख़ौफ़ .. बेफिक्र होकर मिलने के !
 
Copyright@संतोष कुमार 'सिद्धार्थ', २०१३.

Thursday, February 14, 2013

पिताजी का स्वेटर

जीवन की डगर पर 
धूप -छांव में,
सर्द लम्हों  में ,
अकेले सफर में
जब भी कभी
मेरा मन डरता है
कदम बढ़ाते ..
घबराता है
मैं ..आँखे बंद कर
थके शरीर को संभाल 
पिताजी का स्वेटर 
पहन लेता हूँ.
और फिर ..
आत्मविश्वास से भरा मन ले 
तेज - मजबूत कदमों से
दुनिया जीतने निकल पड़ता हूँ.

Copyright@संतोष कुमार 'सिद्धार्थ' , २०१३




Tuesday, January 29, 2013

मैं और तुम !

जब से है..
ये भान हुआ ,
थोडा ज्ञान हुआ
कि तुम ..
बसे हो 
मुझमें भी ..
न जाने कब से ?
अब न मैं हूँ
न अहम है
न कोई वहम है
तुम ही तो हो 
मेरे अंतर में ,
बाहर में ..
यत्र - तत्र ...सर्वत्र !

Copyright@संतोष कुमार 'सिद्धार्थ', २०१३ 

Saturday, January 12, 2013

चलो !

चलो !
कहीं दूर चलें
बहुत दूर चलें
वहाँ चलें
जहाँ.. चेहरे हों
घर हो,
प्रकृति हो,
जीवन हो
पर.. न कोई मेरा हो
न ही कोई तुम्हारा हो
बस बज रहा हो संगीत 
उस जहाँ में..
दिलों के साथ-साथ धडकने का !

Copyright@संतोष कुमार 'सिद्धार्थ', २०१३.



Friday, December 7, 2012

तुम्हारी पहचान !

तुम...
छिपे फिरते हो
रहस्यों की छाया में
ओढ़े रहते हो
सवालों के नकाब ..

करीब होते हो 
प्रेरणा बनकर
प्रदीप्त करते हो
ज्योति बनकर

दिख भी जाते हो
तो रहते हो 
आड़ में सतरंगों के
पानी में ..प्रतिबिम्बों में

गर कभी
खुद ही अपना
परिचय बताते,
जवाब बनकर 
चेहरा दिखाते 
तो सोंचो ..
कितना अच्छा था !

Copyright@संतोष कुमार 'सिद्धार्थ', २०१२

Saturday, October 27, 2012

आजकल

कुछ घुल गया है पानी में,
है  दूषित कर गया 
कोई चमन की  हवा को 
न जाने क्या..शायद कोई 
नया रोग सा लगा है 
इस ज़माने को 

नोचने में कमीजें 
एक - दूसरे की

खुश हो रहे हैं 
लोग कई


बचने की कोशिश में 
जो छुपे किसी  के पहलू में
हैं उनकी चादरें
पहले से कालिख में सनी हुईं

जिधर देखो
रंगे सियारों की
फ़ौज सी खड़ी है

किसके साथ खड़ा होऊं?
आज नहीं तो कल ..
रंग तो सबकी उतरी है

काट कर
बांटने में
व्यस्त हैं जोडने वाले
जो हैं समर्थ
ओढ़ कर मुफलिसी
जड़ रखे हैं 
खुद  के मुंह पर ताले

ऐ खुदा , हे भगवान !
मत हँस..इन गरीबों पर
रहम कर 
भेज कोई रसूल अपना
बहुत हो चुका...
अब सब्र नहीं होता ,
खुद से अपनो का इलाज नहीं होता !!
 
Copyright@संतोष कुमार 'सिद्धार्थ', २०१२