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Tuesday, May 29, 2012

अनुरोध !

क्यों न ?
तुम ..
बाँध लो
मेरा मन
अपने जूडे की
एक शोख लट से.


अक्सर 
बड़ा ही अनमोल,
अकल्पनीय सुकून
पाया है...
मेरे चंचल मन ने
तुम्हारे गेसुओं की खुशबू में
तुम्हारे पलकों की छांव में!


रहा है
आवारगी में
बरसों से ...
ठहर जाऊं, 
बस जाऊँ यहीं
जो तुम्हारी इजाज़त हो!

Copyright@संतोष कुमार 'सिद्धार्थ', २०१२

Friday, April 13, 2012

मिलना ..मेरा - तुम्हारा

जब कभी भी
मेरा  चेहरा
और 
तेरा चेहरा
करीब आते हैं
एक - दूसरे के
और खो देते हैं
कुछ यूँ घूम-मिल कर
अपनी-अपनी पहचान
इस जहाँ में
कहीं न कहीं 
सुबह होती है
शाम होती है
फुहारे पड़ती हैं
खुशबू उडती है
ये धरती
सूरज, चाँद सितारे सभी
सलाम कर रहे होते हैं
अपनी-अपनी अदा से
मुझे और तुझे
और जज्ब कर रहे होते हैं
हमारे अनमोल और अद्भुत 
मिलन के जादू को !


Copyright@संतोष कुमार 'सिद्धार्थ' , २०१२ 


Tuesday, March 27, 2012

मैं कौन हूँ तेरा ..?


जुगनू बनकर
तेरे पीछे-पीछे भागूंगा,
मधुर गीत बन
तुम्हारे कानों से,
तुम्हारे दिल की
धडकनों में उतरूंगा

और जब तुम ...
बंद कर लोगी
पलकें अपनी
मेरे सपनों की अनुभूतियों में,
फिर मैं,
अपने मन के कैनवास पर
तेरा अमिट चित्र उतारूंगा
और बस जाऊँगा ,
तुझसे.. तेरे शहर से कहीं दूर
वहीँ बरसों तक
तेरी बाट निहारूंगा

तू सोंच,
मालूम कर मेरा पता ,
परख कर देख
मन की अनुभूतियों को,
“मैं कौन हूँ तेरा ? “
और क्यों ..
इस जहाँ में आया हूँ !!

Copyright@संतोष कुमार “सिद्धार्थ”, २०१२

Thursday, February 2, 2012

सुनयना ..सुनो ना !


अरी ओ सुनयना ..
जरा करीब तो आओ
बैठो ..पास हमारे
और सुनो..तो
ये बसंती हवा
कहाँ बहती जाए,
क्या कहती जाए
क्यूँ हवा में
खुशबू सी लहराए
क्यूँ भौंरा
फूलों को गुदगुदाए
ये मदमाती साँझ
किसका नाम बुलाए
अब और
कैसे इशारे करूं
तुझे समझाने को,
पास बुलाने को,
जो ना समझ आये
मेरे शब्दों से
चाहो तो ..,
उसे भी सुन लो
लगकर गले मुझसे,
मेरे दिल की धडकनों में..
मेरी मनुहार
ना सही ..
इस ऋतु के जादू का
मान तो रख लो ना..
अरी सुनयना ..सुनो ना !

Copyright@संतोष कुमार ‘सिद्धार्थ’, २०१२ 

Friday, December 16, 2011

प्रेमगीत


जब भी मैं 
लिखना चाहूँ 
कोई नया..प्रेमगीत
पूछता है 
हर अगला हरफ
मुझसे बार-बार
तेरी तस्वीर की तरफ
इशारे करके
इसमें तेरा नाम कहाँ है?
इसमें मेरा नाम कहाँ है?
Copyright@संतोष कुमार "सिद्धार्थ", २०११