मैं तो ..
मुसाफिर था
हूँ अब भी ,
कर्मयोगी मुसाफिर
सफर-दर-सफर,
गोकुल से मथुरा,
मथुरा से हस्तिनापुर
करने थे काम कई
ओढनी थीं
जिम्मेवारियां नयी
जिम्मेवारियां नयी
फिर भी रहा..
सौ प्रतिशत डूबा..
हर रिश्ते में ,
हर जगह, सबके संग
अब मेरी संगिनी,
रुक्मिणी-सदृश..
जो मेरे साथ है
जो मेरे साथ है
तो फिर, मेरी चिंता छोडो ..
तेरा मन, अब भी रहता क्यूँ उदास है?
तुम्हें ही तो..
हमेशा से..पसंद थे,
राधिका के कृष्ण !
किसी ने भला,
ह्रदय में झांक कर..
कृष्ण से..
ये नहीं पूछा ?
ये नहीं पूछा ?
राधिका एवं मीरा में..
और हजारों पटरानियों में
कृष्ण की ..
अपनी पसंद कौन ??
अपनी पसंद कौन ??
Copyright@Santosh Kumar, 2011
(मेरे कविता संग्रह : आधा-अधूरा प्यार से)
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