Saturday, May 3, 2014

रिश्ता : मेरा - तुम्हारा

तू...
कविता है
गीत है
छंद है
भाव है
बसी रहती हो
शब्दों की लड़ियों में 
पुस्तकों के पन्नों में
मैं ...
आवरण हूँ 
पृष्ठभूमि हूँ
रक्षक हूँ
तुम्हारे सौंदर्य का...
तुम सहज स्वप्न हो
मैं यथार्थ हूँ..
बस ..
यही परिभाषा है
इतना सा है
मेरा - तुम्हारा रिश्ता !

Copyright@ संतोष कुमार 'सिद्धार्थ', २०१४.

Friday, March 28, 2014

खोज !

कभी - कभी
सत्य भी 
भाव रूप छोड़ कर
पात्र रूप में
खोज रहा होता है
हमें ..वैसे ही
जैसे हम उसे
और हम दोनों ही
आस-पास होते हैं
गुजर जातेहैं 
अगल-बगल से
बस ..पहचान नहीं पाते !

Copyright@संतोष कुमार 'सिद्धार्थ', २०१४ 

Friday, January 10, 2014

खोज !

मैं
ढूंढ लेता हूँ
तुम्हे..
अक्सर ही
पर ..खुद को खो कर !

Copyright@संतोष कुमार 'सिद्धार्थ', २०१४

Tuesday, October 8, 2013

दूरी

बढती जा रही है
दूरी..
हर रोज 
शहरों की
गाँव से !

हो रहा है
अलग 
हर रोज 
एक सगा 
अपने ही दूसरे से !

मैंने कई बार 
ऐसा सुना है
शहरी स्कूलों के बच्चे
गाँव में
बस रहे भाई को
ड्राईवर का सगा बता रहे थे !

Copyright@संतोष कुमार "सिद्धार्थ", २०१३


Sunday, August 25, 2013

पहचान !

क्षितिज से कुछ दूर सही
धुंधले ..उभरते सायों में
तेरी तरफ भाग रहा 
मैं भी हूँ !
हाथों में पुष्प लिए..
उल्लसित मन लिए 
आतुर हूँ...
मिलने को !
मुझको है ..भान तेरा
तू भी पहचान मुझे
कुछ कदम मैं चलूँ!
कुछ कदम तुम चलो!

Copyright@संतोष कुमार 'सिद्धार्थ', २०१३

Sunday, July 7, 2013

सपने !





आओ सपने पिरोयें
मोतियाँ तुम्हारीं
धागे मैं लाया हूँ !

Copyright@संतोष कुमार 'सिद्धार्थ', २०१३.

Thursday, May 16, 2013

यादों का मुसाफिर

चाहे आवाज दो
या न दो 
या फिर
ओढ़ लो 
नकाब कोई
मैं यादों का मुसाफिर हूँ
समय की रेत पर
तुम्हारे निशान
ढूंढ ही लूँगा !

Copyright@संतोष कुमार 'सिद्धार्थ', २०१३