Thursday, July 30, 2015

कुछ बातें!

मैं सोंचता हूँ...
क्यों ना
लिख लूं
और बाँच भी लूं
खुद ही 
कुछ चिट्ठियाँ
मेरे - तुम्हारे नाम की !

क्या होगा..
थोडा मन हल्का होगा
थोडा भारी होगा..
याद आएँगी
कुछ बातें
बरसों पुराने  शाम की !

ऐसे में ही, कहीं दूर..
कोई बादल
भिगो जायेगा 
तुम्हारे झरोखे के परदे 
शायद ...तब कहीं ,
तुम्हे भी बोध होगा
और लिखोगी सच में 
एक खत मेरे नाम की !

Copyright@संतोष कुमार 'सिद्धार्थ',2015

5 comments:

  1. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (31.07.2015) को "समय का महत्व"(चर्चा अंक-2053) पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है।

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  2. राजेंद्र जी. मेरी रचना चर्चा-मंच में शामिल करने के लिए धन्यवाद !

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  3. ऐसे में ही, कहीं दूर..
    कोई बादल
    भिगो जायेगा
    तुम्हारे झरोखे के परदे
    शायद ...तब कहीं ,
    तुम्हे भी बोध होगा
    और लिखोगी सच में
    एक खत मेरे नाम की !
    बहुत ही सुन्दर जीवन्त भाव है आपकी कविता में।
    स्वयं शून्य

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  4. dil ko chhu gayi aapki rachna....
    aisa laga jaise khud ko padh raha hoon....
    beautiful

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  5. to kuchh bundon k saath ye mn ka mausam b badal jayega

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