Sunday, March 11, 2012

दुआ !


तुम्हे..
नसीब हों
सूरज की रौशनी के
सभी टुकड़े,
वो भी ..
जो मैंने समेटे थे,
सहेज रखे थे,
तुम्हारे आँचल में
और वो भी..
जो हो रहे हैं इकट्ठा
मेरी गठरी में
हर रोज ..
तेरे जाने के बाद .

Copyright@संतोष कुमार ‘सिद्धार्थ’, २०१२

8 comments:

  1. बहुत प्यारी रचना...
    कोमल भाव...

    टंकण त्रुटि ठीक कर लें...तुम्हारी(तुम्हारे) आंचल में

    सादर.

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    1. @Expressions : मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है. सराहना और सलाह के लिए धन्यवाद!

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    1. हबीब जी, बहुत - बहुत धन्यवाद!

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  3. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा आज के चर्चा मंच पर की गई है।
    चर्चा में शामिल होकर इसमें शामिल पोस्ट पर नजर डालें और इस मंच को समृद्ध बनाएं....
    आपकी एक टिप्‍पणी मंच में शामिल पोस्ट्स को आकर्षण प्रदान करेगी......

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  4. अतुल जी ; चर्चा मंच में शामिल करने का शुक्रिया !

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  5. कहाँ से चले आतें हैं शब्द निशब्द चेले बने आपके भावों के पीछे ?

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  6. बहुत खूब....
    बहुत ही बढ़िया रचना है...
    पिछले कुछ दिनों से अधिक व्यस्त रहा इसलिए आपके ब्लॉग पर आने में देरी के लिए क्षमा चाहता हूँ.....!!!!!

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बताएं , कैसा लगा ?? जरुर बांटे कुछ विचार और सुझाव भी ...मेरे अंग्रेजी भाषा ब्लॉग पर भी एक नज़र डालें, मैंने लिखा है कुछ जिंदगी को बेहतर करने के बारे में --> www.santoshspeaks.blogspot.com .