Tuesday, January 29, 2013

मैं और तुम !

जब से है..
ये भान हुआ ,
थोडा ज्ञान हुआ
कि तुम ..
बसे हो 
मुझमें भी ..
न जाने कब से ?
अब न मैं हूँ
न अहम है
न कोई वहम है
तुम ही तो हो 
मेरे अंतर में ,
बाहर में ..
यत्र - तत्र ...सर्वत्र !

Copyright@संतोष कुमार 'सिद्धार्थ', २०१३ 

2 comments:

  1. तुम बसे हो मुझमे..
    मै बसी हूँ तुममे...
    बहुत सुन्दर रचना...
    :-) :-) :-)

    ReplyDelete
  2. बहुत ही खूबसूरत

    ReplyDelete

बताएं , कैसा लगा ?? जरुर बांटे कुछ विचार और सुझाव भी ...मेरे अंग्रेजी भाषा ब्लॉग पर भी एक नज़र डालें, मैंने लिखा है कुछ जिंदगी को बेहतर करने के बारे में --> www.santoshspeaks.blogspot.com .