Thursday, May 16, 2013

यादों का मुसाफिर

चाहे आवाज दो
या न दो 
या फिर
ओढ़ लो 
नकाब कोई
मैं यादों का मुसाफिर हूँ
समय की रेत पर
तुम्हारे निशान
ढूंढ ही लूँगा !

Copyright@संतोष कुमार 'सिद्धार्थ', २०१३ 

5 comments:

  1. समय की रेत पर यादों के निशान ...
    वाह बहुत खूब

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  2. शुक्रिया सदा जी ! यादें रह जाती है...अजर-अम्रर !

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  3. बहुत सुन्दर

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  4. sundar kavitayen ... samay kee ret par nishan dhoondhna badhiya vimb hai...

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  5. Really nice, a good read :)

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