Sunday, August 25, 2013

पहचान !

क्षितिज से कुछ दूर सही
धुंधले ..उभरते सायों में
तेरी तरफ भाग रहा 
मैं भी हूँ !
हाथों में पुष्प लिए..
उल्लसित मन लिए 
आतुर हूँ...
मिलने को !
मुझको है ..भान तेरा
तू भी पहचान मुझे
कुछ कदम मैं चलूँ!
कुछ कदम तुम चलो!

Copyright@संतोष कुमार 'सिद्धार्थ', २०१३

6 comments:

  1. पहचान की डोर थामे कुछ कदम कम होते दोनों ओर से!
    सुन्दर!

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  2. दोनों चलें तो दूरियाँ अधूरी रह जाए..पल में मिट जाएँ...
    वाह!!

    अनु

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  3. कुछ कदम दोनों बढे और मिले ..
    सुन्दर प्रस्तुति...
    :-)

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  4. सुन्दर रचना

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  5. अति सुन्दर ..नवरात्री की बहुत बहुत शुभकामनाएं..

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