Thursday, September 6, 2012

पुरुषार्थ

सैंकडो लोग तालियाँ बजा रहे थे
जोर - जोर से
नाम ले रहे थे ..
उस प्रतिभागी का
जो विजयी हुआ था
दौड की प्रतिस्पर्धा में
पर मैंने देखा..
लोगों के हुजूम से हटकर
एक और भी  प्रतिभागी था
अपने चेहरे पर
विजेता सरीखी मुस्कान ओढ़े हुए
आँखों में उसकी
जरा सा भी मलाल न था..
तकदीर से उसका
कोई भी सवाल न था
उसका पुरुषार्थ कहीं भी पीछे न था , 
वो हार कर भी
जीत गया था
प्रतिस्पर्धा को..
उसने पूरा किया था
माँ को दिया हुआ वचन
अपने स्वाभिमान का, 
आत्मविश्वास का प्रण
कि भले ही वो हारे या जीते
वो दौडेगा जरूर...
भले ही सफलता मंजिल
खड़ी रह जाये... उससे थोड़ी दूर.

Copyright@संतोष कुमार 'सिद्धार्थ', २०१२.





7 comments:

  1. वाह...
    बहुत बढ़िया......

    सादर
    अनु

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  2. वाह ... बेहतरीन

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  3. उत्कृष्ट प्रस्तुति का लिंक लिंक-लिक्खाड़ पर है ।।

    हार जीत से परे जो, पहन गले में हार |
    स्वाभिमान से सिर उठा, जीता यह संसार |
    जीता यह संसार, सफलतम जीवन जीता |
    सतत कर्म आधार, मिले शुभ सकल सुबीता |
    माँ का आशिर्वाद, सनातन मिले रीत से |
    चरैवेति हर समय, परे हों हार जीत से ||

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  4. @रविकर फैजाबादी : महोदय , मेरी रचना शामिल करने के लिए धन्यवाद.

    आपकी पंक्तियाँ भी प्रेरित करती है...चरैवेति ..चरैवेति.

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  5. आत्मविश्वास ही असली जीत है ...

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  6. शुक्रिया ! सच कहा आपने , सच्चा आत्मविश्वास और कभी न हार मानने की भावना ही जीत की राह सुगम करती है.

    आभार

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